तातै अरध कथान यहॠबनारसी चरितà¥à¤° (आतà¥à¤®à¤•था की संवेदना और बनारसीदास जैन का अरà¥à¤§à¤•थानक)
बनारसीदास ने अपनी आतà¥à¤®à¤•था दोहा, चौपाई के 675 छदों में लिखी है। उसमें 573 छंदों में पूरà¥à¤µ जीवनकाल का शैशव, बालà¥à¤¯à¤•ाल, किशोरकाल वयः संधि काल के 14 वरà¥à¤· की आयॠसे 19 वरà¥à¤· तक के 5 वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ के आयà¥à¤•ाल में कà¥à¤²à¤°à¥€à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का तà¥à¤¯à¤¾à¤— कर देने, कà¥à¤² की पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤ ा ताक पर रखकर आशिकबाज बनने, आयॠके 16वें वरà¥à¤· में सिफलिस रोग से गà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤ होने, 24 वरà¥à¤· की आयॠमें वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤¾à¤°à¥€ जीवन आरंठकरने, नेमा साहॠके साà¤à¥€à¤¦à¤¾à¤° बनकर निज उदà¥à¤¯à¤® से लकà¥à¤·à¥à¤®à¥€à¤µà¤¾à¤¨ बनने, फिर साà¤à¤¾ समापà¥à¤¤ कर 30 वरà¥à¤· की आयॠमें आगरा में कपड़े का सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤° वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤¾à¤° करने तक का वृतांत है। इस काल के बाद का उनका जीवन वृतà¥à¤¤à¤¾à¤‚त उनके उतà¥à¤¤à¤° काल का जीवन-वृतà¥à¤¤à¤¾à¤‚त कहा जा सकता है। उनकी सà¥à¤«à¥à¤Ÿ कावà¥à¤¯ कृतियों का संकलन बनारसी विलाप नाम से उनके à¤à¤• à¤à¤•à¥à¤¤ ने किया जो उनके देहांत के बाद ही चैत सà¥à¤¦à¥€ २ संवतॠ1809 (सनॠ1752) में गà¥à¤°à¤‚थरूप में तैयार हो गया। उनकी अंतिम रचना फालगà¥à¤¨ सà¥à¤¦à¥€ सपà¥à¤¤à¤®à¥€ संवतॠ1800 (सनॠ1743) में समापà¥à¤¤ हà¥à¤ˆà¥¤ इससे अनà¥à¤®à¤¾à¤¨ लगाया जा सकता है कि उनका देहांत उसके बाद ही संवतॠ1800 (सनॠ1743) के लगà¤à¤— हो गया था।
बनारसीदास की आतà¥à¤®à¤•था में उनके देशकाल के अनेकानेक दà¥à¤°à¥à¤²à¤ चितà¥à¤° सितारों की à¤à¤¾à¤‚ति à¤à¤¿à¤²à¤®à¤¿à¤²à¤¾à¤¤à¥‡ दिखाई पड़ते हैं। सच साकार हो उठता है | उनका अरà¥à¤§à¤•थानक इस दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से हिंदी आतà¥à¤®à¤•थाओं का अधिषà¥à¤ ान है |
"तातै अरध कथान यहॠबनारसी चरितà¥à¤° (आतà¥à¤®à¤•था की संवेदना और बनारसीदास जैन का अरà¥à¤§à¤•थानक)", TIJER - TIJER - INTERNATIONAL RESEARCH JOURNAL (www.TIJER.org), ISSN:2349-9249, Vol.12, Issue 4, page no.a879-a883, April-2025, Available :https://tijer.org/TIJER/papers/TIJER2504126.pdf
Volume 12
Issue 4,
April-2025
Pages : a879-a883
Paper Reg. ID: TIJER_157543
Published Paper Id: TIJER2504126
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Research Area: Languages
Country: LUCKNOW, UTTAR PRADESH, India
ISSN: 2349-9249 | IMPACT FACTOR: 8.57 Calculated By Google Scholar | ESTD YEAR: 2014
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Publisher: TIJER (IJ Publication) Janvi Wave